दीपावली 2026: धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दिवाली
के 15 खास उपाय, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और धन
प्राप्ति के उपाय
दीपावली का त्योहार सनातन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इस दिन माता महालक्ष्मी और भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि दीपावली की रात माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-वैभव और खुशहाली आती है।
दीपावली विशेषांक के इस लेख में हम जानेंगे कि आप भारत या विदेश के किसी भी कोने में रहते हुए धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली का त्योहार किस प्रकार मना सकते हैं। साथ ही जानेंगे कि इन तीनों दिनों में पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और किन उपायों को करने से माता लक्ष्मी, भगवान गणेश तथा भगवती बगलामुखी की कृपा प्राप्त हो सकती है।
इस लेख में धनतेरस के 5 विशेष उपाय, नरक चतुर्दशी के 5 उपाय और दीपावली के कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं। इसके अलावा दीपावली पर किस लग्न में पूजा करना अधिक उत्तम माना गया है, सिंह लग्न और वृषभ लग्न का महत्व क्या है तथा कालरात्रि में कौन-कौन से धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकते हैं, इसकी भी जानकारी दी गई है।
दीपावली का धार्मिक महत्व
दीपावली कार्तिक कृष्ण अमावस्या को मनाई जाती है। यह त्योहार सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम रावण का वध करके माता सीता और अपने अनुचरों के साथ पुनः अयोध्या लौटे थे। उनके अयोध्या आगमन पर पूरी नगरी में उत्सव मनाया गया और दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया। इसी घटना की स्मृति में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है।
इसके साथ ही मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से माता भगवती राजराजेश्वरी महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था।
आगम और निगम शास्त्रों, तंत्र, वेद तथा पुराणों में कालरात्रि और दीपावली की साधना का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता के अनुसार, हिमालय का शिखर हिल सकता है, समुद्र सुखाया जा सकता है और ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बड़े-बड़े पर्वत भी नष्ट हो सकते हैं, लेकिन दीपावली की कालरात्रि में भगवान देवाधिदेव महादेव, शिवशंकर तथा राजराजेश्वरी, बगलामुखी और दशमहाविद्याओं का किया गया अनुष्ठान कभी निष्फल नहीं जाता।
इस दिन गृहस्थ लोग सामान्य पूजा के साथ-साथ अपनी परंपरा और गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार पूजा, उपासना, तपस्या, साधना, हवन और अनुष्ठान भी कर सकते हैं।
दीपावली 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त और लग्न का महत्व
दीपावली के दिन कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रदोष काल में स्थिर लग्न में पूजा करने का विशेष महत्व माना गया है। यदि आप अपनी कुल परंपरा के अनुसार प्रतिष्ठान में पूजा करते हैं, तो प्रतिष्ठान में ही पूजा करें। यदि घर में पूजा करने की परंपरा है, तो घर पर ही पूजा करें।
काशी पंचांग और जैन पंचांग के अनुसार बताए गए समय के मुताबिक प्रदोष काल का मुहूर्त शाम 5:45 बजे से रात 8:19 बजे तक रहेगा।
इस दौरान वृषभ लग्न में माता महालक्ष्मी, भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा करना शुभ माना गया है।
वृषभ लग्न में पूजा का शुभ समय
वृषभ लग्न का समय शाम 6:09 बजे से रात 8:00 बजे तक बताया गया है। हालांकि, शुभ मुहूर्त की विशेष गणना के अनुसार लाभ और शुभ चौघड़िया का ध्यान रखना चाहिए।
मुहूर्त प्रदीप ग्रंथ के आधार पर बताए गए समय के अनुसार शाम 7:15 बजे से रात 8:00 बजे के बीच दीपावली का पूजन करना अत्यंत श्रेष्ठ और श्रेयस्कर माना गया है।
सिंह लग्न में पूजा का महत्व
दीपावली पूजा को लेकर एक सामान्य धारणा यह है कि वृषभ लग्न में ही पूजा करना सबसे उत्तम होता है। हालांकि, तांत्रिक और गुप्त विधान में सिंह लग्न का भी विशेष महत्व बताया गया है।
मान्यता के अनुसार, धन प्राप्ति, श्री प्राप्ति, इच्छित लक्ष्मी, चंचला लक्ष्मी और अष्टलक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए कुछ साधक सिंह लग्न में रात्रि के समय पूजा करते हैं।
कालरात्रि, शिवरात्रि, जन्माष्टमी और होलिका दहन जैसी रात्रियों को विशेष माना गया है। इन रात्रियों में साधना करने का विशेष महत्व बताया गया है।
बताए गए मुहूर्त के अनुसार सिंह लग्न रात्रि 12:45 बजे से शुरू होकर सुबह 2:42 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान साधक अपनी परंपरा और गुरु के मार्गदर्शन में पूजा, जप, हवन और अनुष्ठान कर सकते हैं।
अभिजित मुहूर्त में साधना
भगवती राजराजेश्वरी, बगलामुखी, मां कालिका और कामाख्या के उपासक अभिजित मुहूर्त में भी अपने मूल मंत्रों का जप कर सकते हैं।
बताए गए समय के अनुसार दिन में 11:45 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक गुरु के सानिध्य में मंत्र जप किया जा सकता है।
इसके अलावा रात्रि में 11:30 बजे से 1:00 बजे तक भी पूजा-पाठ और होम-अनुष्ठान करने का समय बताया गया है।
दीपावली पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कैसे करें?
दीपावली के दिन गृहस्थ परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं। इस दौरान परिवार के बच्चों, माता-पिता और अन्य सदस्यों को भी पूजा में शामिल करना चाहिए।
1. पूजा की स्थापना और आसन
सबसे पहले माता भगवती महालक्ष्मी के लिए लाल रंग का आसन प्रस्तुत करें। लकड़ी के चौकी या पट्टे पर माता महालक्ष्मी की प्रतिमा अथवा तस्वीर स्थापित करें।
गंगाजल से स्नान करवाने के बाद माता महालक्ष्मी को स्थापित करें।
इसके बाद माता महालक्ष्मी के वाम भाग यानी बाईं तरफ भगवान गणेश को और दक्षिण भाग यानी दाईं तरफ माता महासरस्वती को स्थापित करें।
तीनों देवताओं के सामने चांदी का सिक्का, सोने का सिक्का या कुबेर की छोटी प्रतिमा रख सकते हैं। यदि इनमें से किसी की व्यवस्था नहीं है, तो एक रुपये का सिक्का भी रखा जा सकता है।
2. ग्राम देवता और क्षेत्रपाल का पूजन
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पूजा में क्षेत्रपाल और ग्राम देवता का विशेष स्थान माना जाता है। यक्ष और भैरव भी ग्राम देवताओं की परंपरा से जुड़े माने जाते हैं।
इसके लिए अपने खेत की मिट्टी या घर की शुद्ध मिट्टी का एक मोटा टुकड़ा लेकर आएं। उस पर कलावा या मौली का धागा बांधकर उसे गणेश रूप, धन-धान्य और अन्नपूर्णा गणेश के रूप में पूजा स्थान पर स्थापित कर सकते हैं।
3. दीपक की स्थापना
पूजा में दो दीपक जलाने का विधान बताया गया है।
- तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक माता महालक्ष्मी के वाम भाग यानी बाईं तरफ रखें।
- कपिला गाय या देसी गाय के घी का दीपक दाईं तरफ यानी दक्षिण भाग में रखें।
यदि दो दीपकों की व्यवस्था नहीं है, तो केवल एक घी का दीपक भी जलाया जा सकता है।
तिल या सरसों के तेल के दीपक में: पीली सरसों, कामिया सिंदूर, हनुमान सिंदूर और दो लौंग डालें।
घी के दीपक में: दो इलायची, दो लौंग, पीली सरसों और थोड़ा सा इत्र डालें। इसके साथ कामिया सिंदूर या केसर के दाने भी डाल सकते हैं।
दीपक की स्थापना करने के बाद उसका पूजन भी करें। दीपक को दीपनारायण मानकर गंध, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। इसके बाद ही आगे की पूजा शुरू करें।
4. देवी-देवताओं का पूजन
सभी देवी-देवताओं को आसन और आचमन प्रदान करें। इसके बाद भगवान गणेश का पंचोपचार पूजन करें और धूप, दीप, नैवेद्य तथा अक्षत अर्पित करें।
इसके बाद माता महालक्ष्मी और माता महासरस्वती का पूजन करें।
आप अपनी मूल देवी-देवता की तस्वीर या प्रतिमा भी पूजा में स्थापित कर सकते हैं।
5. कुलदेवी और मूल आराध्या का पूजन
कई लोगों के मन में यह सवाल होता है कि कुलदेवी अधिक शक्तिशाली होती हैं या मूल आराध्या देवी?
मान्यता के अनुसार, कुलदेवी ही व्यक्ति को उसकी आराध्या तक पहुंचाती हैं। कुलदेवी अपने कुल की परंपरा और उसके सदस्यों से जुड़ी होती हैं।
जब आप अपनी आराध्या देवी तक पूजा, उपासना और साधना का भाव पहुंचाना चाहते हैं, तो कुलदेवी और कुलदेवता को माध्यम माना जा सकता है।
पूजा में भाव का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान के सामने चढ़ाई जाने वाली सामग्री से अधिक महत्व उस भावना का होता है जिसके साथ भक्त उसे अर्पित करता है।
सुदामा की तरह जो भी फल, फूल और सामग्री आप भगवान को अर्पित करते हैं, उसका वास्तविक महत्व आपके भाव में होता है।
जब साधक भावपूर्वक अपनी मूल आराध्या का मंत्र जप, अनुष्ठान, पूजा, हवन और पाठ करता है, तब मूल देवी की उपासना प्रधान हो जाती है।
इसलिए कुलदेवी और मूल आराध्या दोनों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है। पूजा में दोनों का स्मरण और पूजन करना चाहिए।
आप कुलदेवता और कुलदेवी को अक्षत अर्पित करते हुए उनका ध्यान कर सकते हैं। इसके साथ पितृ देवताओं का भी स्मरण करें।
इसके बाद अपनी मूल आराध्या देवी और गुरु चरणों का पूजन करें।
6. माता लक्ष्मी को तिलक और भोग कैसे अर्पित करें?
दीपावली पूजन में माता महालक्ष्मी और भगवान गणेश को अक्षत अर्पित करने के साथ रोली, चंदन, हल्दी, केसर और कामिया सिंदूर से तिलक लगाया जा सकता है।
माता को प्रसन्न करने के लिए केसर, हल्दी, रोली, चंदन और कामिया सिंदूर मिलाकर तिलक तैयार किया जा सकता है।
नैवेद्य में क्या चढ़ाएं?
माता महालक्ष्मी को निम्नलिखित प्रसाद अर्पित कर सकते हैं:
- सफेद मिठाई
- बर्फी
- रसगुल्ले
- मखाने की खीर
- केसर मिश्रित खीर
- गाय के खोए से बनी मिठाई
- देसी चीनी या देसी खांड से तैयार प्रसाद
प्रसाद तैयार करने के बाद उसे शुद्ध करके माता को अर्पित करें।
7. माता लक्ष्मी को कौन से फूल चढ़ाएं?
माता और अन्य देवी-देवताओं को निम्नलिखित फूल अर्पित किए जा सकते हैं:
- कमल का फूल
- कनेर का फूल
- गेंदे का फूल
- गुड़हल का फूल
- गुलाब का फूल
- हरसिंगार का फूल
फूलों पर थोड़ा इत्र भी लगाया जा सकता है।
8. फूल और नैवेद्य का शुद्धिकरण
देवी-देवताओं को फूल और नैवेद्य अर्पित करने से पहले उनका शुद्धिकरण करने की विधि बताई गई है।
इसके लिए सबसे पहले चक्र मुद्रा दिखाएं। इसके बाद धेनु मुद्रा और फिर बीजाक्षर मुद्रा दिखाएं।
यदि गुरु ने बीज मंत्र दिया है, तो अक्षरमाला या हस्तमाला पर बीज मंत्र का जप करें। कम से कम 7 या 11 बार मंत्र जप करने का विधान बताया गया है।
यदि आपके पास कोई बीज मंत्र नहीं है, तो श्री या क्लीं बीजाक्षर से मुद्रा दिखा सकते हैं।
इसके बाद मत्स्य मुद्रा दिखाएं। इस प्रकार शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी होती है।
जल के साथ भगवती को पुष्प और नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है।
9. नैवेद्य अर्पित करते समय पंचप्राणों का स्मरण
जब आप देवी-देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं, तो सभी मुद्राएं दिखाने के साथ पंचमहाभूत और पांच प्राणों का भी स्मरण करें।
हाथ में आचमनी से जल लेकर निम्न मंत्रों का उच्चारण करें:
- ॐ प्राणाय स्वाहा।
- ॐ उदानाय स्वाहा।
- ॐ अपानाय स्वाहा।
- ॐ व्यानाय स्वाहा।
- ॐ समानाय स्वाहा।
इसके बाद जल को घुमाकर देवता को प्रसाद अर्पित करें।
10. माता महालक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन
माता महालक्ष्मी के पूजन में धूप, दीप, नैवेद्य, गंध, अक्षत, पुष्प और जनेऊ अर्पित करें।
पंचदेवताओं को पांच जनेऊ अर्पित करने का विधान बताया गया है। इसके साथ वस्त्र और उपवस्त्र भी अर्पित करें।
चंदन और इत्र भी अर्पित कर सकते हैं।
माता को जायफल और केसर मिश्रित जल से पांच गोमती चक्र अर्पित करें। इन्हें पंचमहाभूत के रूप में अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
इसके अलावा पूजा में अपनी सामर्थ्य के अनुसार कमल गट्टे, पीली कौड़ियां, शंख और अन्य पूजन सामग्री रख सकते हैं।
यदि अधिक सामग्री की व्यवस्था न हो, तो केवल जल अर्पित करके भी माता की पूजा की जा सकती है। पूजा में सामग्री से अधिक महत्व भाव का माना गया है।
दीपावली पूजा में कुबेर शंख, शुक्र शंख और गणेश शंख का महत्व
यक्षराज कुबेर और माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शाक्त संप्रदाय के साधक अपनी पूजा में विभिन्न प्रकार के शंख रखते हैं।
1. कुबेर शंख
कुबेर शंख को दुर्लभ माना जाता है। इसमें अक्षत, गंध, पुष्प और त्रिअक्षत भरने का विधान बताया गया है।
त्रिअक्षत बनाने के लिए अक्षत में रोली, हल्दी और घी मिलाया जाता है। इसके बाद शंख को इन सामग्रियों से भरकर उसके ऊपर एक दीपक स्थापित किया जाता है।
पूजा में कुबेर शंख रखते समय इसकी पूंछ अपनी तरफ रखनी चाहिए।
मान्यता के अनुसार, कुबेर शंख रखने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
2. शुक्र देवता का शंख
यदि कुबेर शंख उपलब्ध न हो, तो शुक्र देवता का शंख भी पूजा में रखा जा सकता है।
मान्यता के अनुसार, शुक्र शंख की स्थापना से शुक्र की वृद्धि, ऐश्वर्य, धन, मान-सम्मान और गृहस्थ जीवन में सुख-शांति प्राप्त होती है।
3. गणेश शंख
पूजा में गणेश शंख भी रखा जा सकता है। गणेश शंख का केसर से अभिषेक करके पंचोपचार पूजन करने का विधान बताया गया है।
मान्यता के अनुसार, इससे भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और विघ्नों का नाश होता है।
इन शंखों को अपनी पूजा में स्थापित करके यक्षराज कुबेर, शुक्र देवता, माता महालक्ष्मी और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने की कामना की जा सकती है।
धनतेरस के 5 विशेष उपाय
धनतेरस के दिन धन प्राप्ति, ऐश्वर्य वृद्धि, मान-सम्मान और सुख-समृद्धि के लिए कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं।
इन उपायों को देश या विदेश में कहीं भी आसानी से किया जा सकता है। इनके लिए बहुत अधिक पूजन सामग्री की आवश्यकता नहीं है।
उपाय नंबर 1: आटे का चौमुखी दीपक जलाएं
धनतेरस के दिन शाम के समय उस आटे से चौमुखी दीपक बनाएं, जिसका उपयोग आप रोटी बनाने के लिए करते हैं।
इस दीपक में दो बातियां क्रॉस करके लगाएं। इसके बाद इसमें पीली सरसों, दो लौंग और तिल का तेल डालें।
ध्यान रखें कि इस दीपक में घी का नहीं, बल्कि तिल के तेल का उपयोग करना है।
इस दीपक को शाम 5 बजे, 6 बजे या 7 बजे के आसपास गोधूलि बेला में अपने घर की चौखट पर जलाकर रखें।
मान्यता के अनुसार, आटे का यह दीपक नकारात्मकता का नाश करने, स्वास्थ्य प्रदान करने और अखंड कीर्ति प्राप्त करने के लिए विशेष माना गया है।
उपाय नंबर 2: आंवले के रस से स्नान करें
धनतेरस के दिन पूरे परिवार को आंवले के रस से स्नान करने का उपाय बताया गया है।
इसके लिए आंवले का ताजा रस निकालें। आंवले को अंग्रेजी में गूजबेरी (Gooseberry) कहा जाता है।
यदि ताजा रस उपलब्ध नहीं है, तो बोतल में मिलने वाले आंवले के रस का भी उपयोग कर सकते हैं।
नहाने के पानी में आंवले का रस मिलाकर स्नान करें।
उपाय नंबर 3: धनिया और पीली सरसों से धूनी दें
धनतेरस के दिन यश, ऐश्वर्य, मान-सम्मान, धन प्राप्ति, शत्रु शमन और नवग्रहों की कृपा के लिए यह उपाय बताया गया है।
अपने दाएं हाथ में 27 साबुत धनिए के दाने और दो चुटकी पीली सरसों लें। इसमें थोड़ा सा गाय का घी मिलाएं।
इसके बाद जलते हुए गाय के गोबर के उपले पर कपूर के साथ इन सामग्रियों को डालकर धूनी दें।
यह उपाय शाम के समय करना बताया गया है।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय से धन प्राप्ति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
उपाय नंबर 4: आकड़े के फूलों की माला भगवान शिव को चढ़ाएं
धनतेरस की सुबह मदार यानी आकड़े के पेड़ के पास जाएं और वहां से फूल लेकर आएं।
इन फूलों की माला बनाएं। माला में 16 या 27 फूल रख सकते हैं।
इसके बाद माला पर भगवान शिव को प्रिय खस का इत्र लगाएं।
सुबह शिवालय जाकर भगवान शिव के शिवलिंग पर यह माला अर्पित करें। माला चढ़ाते समय इस मंत्र का उच्चारण करें:
ॐ श्री अघोराभ्यां नमः।
इस मंत्र का जप करते हुए माला शिवलिंग पर अर्पित करें।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय से भगवान शिव की कृपा और धन प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
उपाय नंबर 5: चांदी की डिब्बी में शहद और नागकेसर रखें
धनतेरस के दिन एक छोटी चौकोर चांदी की डिब्बी लें। इसमें असली देसी शहद भरें।
इसके बाद इसमें नागकेसर के छोटे-छोटे दाने डालें।
अब एक भोजपत्र लें और उस पर लाल स्याही, षटगंध, रोली या कामिया सिंदूर से अपना नाम और गोत्र लिखें।
उदाहरण के लिए, यदि आपका नाम रमेश कुमार है और गोत्र भारद्वाज है, तो भोजपत्र पर अपना नाम और गोत्र लिखें।
इस पर्ची को मोड़कर शहद और नागकेसर वाली डिब्बी में डाल दें। इसके बाद डिब्बी बंद करके उस पर कलावा बांध दें।
इसे धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली की पूजा में रखें। पूजा के बाद इसे अपनी तिजोरी में या घर के पश्चिम दिशा वाले कोने में रख सकते हैं।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय से धन और आकर्षण की प्राप्ति होती है तथा शत्रुता समाप्त होकर मित्रता बढ़ती है।
नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली के 5 विशेष उपाय
नरक चतुर्दशी को काली चौदस या छोटी दिवाली भी कहा जाता है।
इस दिन धन प्राप्ति, आकर्षण, नजर दोष से बचाव, शत्रु शमन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं।
उपाय नंबर 1: माता दुर्गा को पान का पत्ता अर्पित करें
यदि आपको लगता है कि किसी ने आपके ऊपर तंत्र प्रयोग किया है या नजर दोष, स्वास्थ्य हानि, धन हानि अथवा गृह क्लेश की समस्या हो रही है, तो नरक चतुर्दशी के दिन यह उपाय कर सकते हैं।
इस दिन एक साबुत पान का पत्ता लें। ध्यान रखें कि उसका डंठल हटाया हुआ न हो।
अब असली केसर, चंदन या गुलाब का इत्र और देसी गाय का घी मिलाकर एक मिश्रण तैयार करें।
इस मिश्रण को पान के पत्ते पर लगाएं।
इसके साथ 11 रुपये और पीला प्रसाद रखें। प्रसाद के रूप में निम्नलिखित में से कोई एक चीज ले सकते हैं:
- बूंदी के लड्डू
- बेसन की बर्फी
- चना दाल की बर्फी
- मूंग की बर्फी
इसके बाद किसी ऐसे दुर्गा मंदिर में जाएं जहां माता सिंह पर सवार हों। पंडित जी की आज्ञा से माता को यह सामग्री अर्पित करें।
माता दुर्गा की तीन परिक्रमा करें। यदि मंदिर जाना संभव न हो, तो अपने स्थान पर ही तीन परिक्रमा कर सकते हैं।
इसके बाद माता के सामने अपनी मनोकामना व्यक्त करें।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय से माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और शत्रुओं तथा नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है।
उपाय नंबर 2: सफेद मदार के पेड़ का पूजन करें
नरक चतुर्दशी यानी काली चौदस के दिन संध्या समय सफेद मदार के पेड़ के पास जाएं।
सबसे पहले पेड़ पर थोड़ा जल अर्पित करें। इसके बाद सिंदूर, कुमकुम, रोली, कामिया सिंदूर और अक्षत चढ़ाएं।
दक्षिणा के रूप में एक रुपये का सिक्का रखें।
इसके बाद एक दोने में सफेद बर्फी का प्रसाद रख दें।
पेड़ के पास फूलबत्ती वाला घी का दीपक जलाएं। एक परिक्रमा करें और इस प्रकार प्रार्थना करें:
हे धनदा यक्षिणी! मुझे धन दें, धन दें, धन दें।
मान्यता के अनुसार, मदार के पेड़ में निवास करने वाली धनदा यक्षिणी की कृपा से धन, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
उपाय नंबर 3: पांच नींबू के दीपक बनाकर पीपल के पेड़ के पास जलाएं
काली चौदस के दिन पांच नींबू लें। पीले नींबू उपलब्ध हों तो उन्हें अधिक अच्छा माना गया है।
नींबू को इस प्रकार काटें कि पांच दीपक बनाए जा सकें। इन दीपकों में तेल भरें।
इसके बाद इनमें सिंधूर या कामिया सिंदूर, दो लौंग, पीली सरसों, सफेद गुग्गुल के 11 टुकड़े और मालकांगनी के 11 बीज डालें।
लंबी बाती लगाकर इन पांच दीपकों को पीपल के वृक्ष के पास जलाएं।
इस उपाय को शत्रु शमन और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से मुक्ति की कामना के लिए बताया गया है।
उपाय नंबर 4: बरगद के पेड़ पर मनोकामना की गांठ बांधें
नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली के दिन संध्या समय गोधूलि बेला में एक सामान्य मिट्टी का दीपक लें।
इसमें घी भरकर फूलबत्ती लगाएं।
इसके बाद बरगद के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं और अपनी मनोकामना मन में तीन बार बोलें।
पेड़ की सबसे लंबी शाखा में एक गांठ बांध दें।
इसके बाद प्रार्थना करें कि जब आपकी मनोकामना पूरी हो जाएगी, तब आप सफेद बर्फी का भोग लगाकर इस गांठ को खोलेंगे।
मनोकामना पूरी होने के बाद उसी गांठ को खोलने जाएं और बरगद के पेड़ पर पान के पत्ते के साथ सफेद बर्फी का भोग जरूर लगाएं।
उपाय नंबर 5: कुलदेवी और ग्राम देवता को प्रसाद अर्पित करें
छोटी दिवाली के दिन अपने कुलदेवी-देवताओं और ग्राम देवताओं के स्थान पर जाएं।
वहां निम्नलिखित सामग्री अर्पित करें:
- दो आंवले
- पांच सिंघाड़े
- एक इत्र की बोतल
- धूपबत्ती
- सफेद प्रसाद
यदि आप चाहें, तो इसके साथ पीले कनेर के फूल भी अर्पित कर सकते हैं।
सभी सामग्री चढ़ाने के बाद तीन बार दंडवत प्रणाम करें।
मान्यता के अनुसार, ग्राम देवता, ग्राम भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
दीपावली के 5 विशेष उपाय: धन वृद्धि और माता लक्ष्मी की कृपा
के लिए
कार्तिक कृष्ण अमावस्या यानी दीपावली की रात को माता महालक्ष्मी की पूजा के साथ कुछ विशेष उपाय करने का भी विधान बताया गया है।
उपाय नंबर 1: दक्षिणावर्ती शंख के जल से पूरे घर में छिड़काव करें
दीपावली के दिन दक्षिणावर्ती शंख लें। इसमें गंगाजल, मिश्री, केसर और इत्र मिलाएं।
माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा पूरी करने के बाद उनकी 27 बार परिक्रमा करें।
इसके बाद शंख में रखे जल को पूरे घर में छिड़कें और थोड़ा सा जल अपने मस्तक पर भी लगाएं।
मान्यता के अनुसार, इससे पूरे वर्ष माता महालक्ष्मी की कृपा घर और प्रतिष्ठान पर बनी रहती है।
उपाय नंबर 2: नवग्रहों की शांति के लिए पीतल या तांबे का लोटा रखें
दीपावली की कालरात्रि में नवग्रहों को अनुकूल बनाने के लिए एक पीतल या तांबे का लोटा लें।
इसमें निम्नलिखित सामग्री समान मात्रा में भरें:
- साबुत मूंग
- खस के दाने
- पीली सरसों
ध्यान रखें कि लोटे में सबसे नीचे मूंग, उसके ऊपर खस के दाने और सबसे ऊपर पीली सरसों होनी चाहिए।
इसके साथ एक रुपये का सिक्का या चांदी का सिक्का रखें।
अब लोटे का मुंह बंद करके उसे पीले कपड़े से बांध दें। इसके बाद लाल धागे से इसे बांधकर उत्तर-पूर्व दिशा यानी नॉर्थ-ईस्ट में रख दें।
अगली दीपावली पर इसे बदलने का विधान बताया गया है।
मान्यता के अनुसार, इससे धन-धान्य और माता अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
इसके साथ माता महालक्ष्मी के सामने सौभाग्य नवरत्न स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। मान्यता है कि इसके पाठ से धन स्थिर रहता है और अनावश्यक रूप से घर से बाहर नहीं जाता।
उपाय नंबर 3: पान के पत्ते से रुका हुआ धन वापस पाने का उपाय
यदि किसी व्यक्ति के पास आपका पैसा है और वह बार-बार बहाने बनाकर धन वापस नहीं कर रहा है, तो यह उपाय बताया गया है।
एक पान का पत्ता लें और जायफल का पेस्ट तैयार करें।
इसके बाद अपनी तर्जनी उंगली से पान के पत्ते पर उस व्यक्ति का नाम लिखें जिससे आपको पैसा प्राप्त करना है।
अब एक पीला कनेर का फूल लें।
पान के पत्ते और कनेर के फूल को मौली या कलावे के धागे से भगवान शिव के शिवलिंग पर बांधकर आएं।
ध्यान रखें कि पान के पत्ते पर लिखा हुआ नाम बाहर की तरफ होना चाहिए, अंदर की तरफ नहीं।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय से रुके हुए धन की प्राप्ति की कामना की जाती है।
उपाय नंबर 4: अनार का दीपक बनाकर माता लक्ष्मी को अर्पित करें
दीपावली की रात माता राजराजेश्वरी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अनार का दीपक बनाने का विशेष विधान बताया गया है।
इसके लिए एक देसी अनार लें और उसे काटकर उसके बीज निकाल दें।
अब अनार के अंदर घी भरें।
दीपक की बाती धतूरे से बनाई जा सकती है। यदि धतूरे की बाती बनाना संभव न हो, तो सामान्य रूई की बाती में धतूरे का रस लगाकर बाती तैयार करें।
इसके बाद घी में इत्र, पीली सरसों, लौंग, इलायची, कपूर और थोड़ा सा दालचीनी पाउडर मिलाएं।
इस दीपक को माता महालक्ष्मी को अर्पित करें या दीपावली की रात दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थापित करें।
ध्यान रखें कि दीपक में घी की कमी न हो और वह ब्रह्म मुहूर्त तक जलता रहे।
मान्यता के अनुसार, इस उपाय को धन प्राप्ति और वर्षभर समृद्धि की कामना से किया जाता है।
उपाय नंबर 5: अपामार्ग की जड़ और रक्त गुंजा को लाल कपड़े में बांधें
इस उपाय में माता महालक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की कामना की जाती है।
सबसे पहले अपामार्ग के पेड़ की जड़ प्राप्त करें। अपामार्ग को अंधी झारा या चिरचिटा भी कहा जाता है।
छोटी दिवाली के दिन पेड़ के पास जाकर उसका पूजन करें और जड़ लेने का आमंत्रण दें।
पंचोपचार पूजन करने के बाद दीपावली की सुबह उसकी जड़ लेकर आएं।
जड़ को गंगाजल से धोकर पंचोपचार पूजन करें।
इसके बाद एक लाल कपड़ा लें और उसमें निम्नलिखित सामग्री रखें:
- अपामार्ग की जड़
- एक रुपये का सिक्का या चांदी का सिक्का
- रक्त गुंजा के 11 दाने
इन सभी को लाल कपड़े में रखकर गांठ बांध दें।
इसके बाद दीपावली की पूजा में इसे रखें और फिर अपनी तिजोरी में स्थापित करें।
मान्यता के अनुसार, अपामार्ग को भगवान विष्णु और बुध का प्रतीक माना गया है। माता महालक्ष्मी, रक्त गुंजा और अपामार्ग को एक साथ रखने से स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति की कामना की जाती है।
माता महालक्ष्मी को चंचला कहा जाता है, लेकिन भगवान विष्णु के साथ उनका संबंध स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस उपाय को धन को स्थिर रखने के लिए विशेष बताया गया है।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली पर इन बातों का रखें ध्यान
दीपावली, धनतेरस और नरक चतुर्दशी के तीनों दिन धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस दौरान कुछ विशेष सावधानियां रखने की सलाह दी गई है।
- इन तीनों दिनों में महिलाओं को खुले बाल करके बाहर जाने से बचना चाहिए।
- यदि कपड़े बाहर सुखाए गए हैं, तो सूर्यास्त से पहले उन्हें घर के अंदर ले आएं।
- किसी भी चौराहे से गुजरते समय वहां रखे मटके या लोटे में रखी सामग्री को स्पर्श न करें।
- मिठाई का सेवन सोच-समझकर करें। विशेष रूप से किसी दूसरे व्यक्ति के घर से आई मिठाई के सेवन को लेकर सावधानी रखने की बात कही गई है।
- यदि घर में कोई मिठाई आती है, तो क्षेत्रपाल और संबंधित शक्ति के निमित्त उसमें से कुछ हिस्सा अलग करके बाहर रख देने का विधान बताया गया है।
- दीपावली के इन दिनों में आम, बबूल, कीकर, इमली, रातरानी और ऊद के पेड़ों के पास जाने, उन्हें स्पर्श करने या उनके नीचे बैठने से बचने की सलाह दी गई है।
दीपावली पूजा के बाद दिखाएं ये तीन विशेष मुद्राएं
जब आप माता राजराजेश्वरी महालक्ष्मी का संपूर्ण पूजन कर लें और नैवेद्य, जल, आरती, दक्षिणा, प्रदक्षिणा तथा क्षमा प्रार्थना अर्पित कर दें, तब माता को विशेष मुद्राएं दिखाने का विधान बताया गया है।
इसमें तीन मुद्राएं महत्वपूर्ण हैं:
- लक्ष्मी मुद्रा
- कुबेर मुद्रा
- विष्णु मुद्रा
विष्णु मुद्रा दिखाने के लिए दो उंगलियों को बाहर की तरफ खोलकर मुद्रा दिखाई जाती है।
मान्यता के अनुसार, इन मुद्राओं को दिखाने से अखंड धन की प्राप्ति की कामना की जाती है।
दीपावली पर माता महालक्ष्मी के सामने बोलें ये विशेष शब्द और
मंत्र
दीपावली के दिन मंत्र जप के साथ कुछ विशेष शब्दों का उच्चारण करने का भी विधान बताया गया है।
माता भगवती और महालक्ष्मी के सामने पूजा के बाद निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण कर सकते हैं:
- पद्मा
- सुरभि
- श्रद्धा
इनके साथ श्री पद्मायै नमः, श्री सुरभ्यै नमः और श्री श्रद्धायै नमः का उच्चारण किया जा सकता है।
इसके अलावा माता महालक्ष्मी को शुक्लाम्बरा नाम अत्यंत प्रिय बताया गया है।
आप पूजा में बार-बार शुक्लाम्बरा नाम का उच्चारण कर सकते हैं।
माता महालक्ष्मी को शाश्वत स्वरूप मानते हुए निम्न मंत्र का जप भी कर सकते हैं:
श्री शाश्वताय नमः।
इसके अलावा माता दुर्गा और महालक्ष्मी के स्वरूप का स्मरण करते हुए शाश्वत नाम का उच्चारण किया जा सकता है।
यक्षराज कुबेर को प्रसन्न करने का मंत्र
यदि आप माता महालक्ष्मी के साथ यक्षराज कुबेर की कृपा भी प्राप्त करना चाहते हैं, तो दीपावली पूजन में इस मंत्र का जप कर सकते हैं:
ॐ श्री भगवते यक्षस्वरूपाय रुद्रप्रियाय धनाध्यक्षाय नमो नमः।
इस मंत्र के माध्यम से यक्षराज कुबेर का स्मरण और पूजन किया जा सकता है।
बगलामुखी साधकों को दीपावली पर क्या करना चाहिए?
भगवती राजराजेश्वरी, बगलामुखी और पीताम्बरा महामाई के साधकों के लिए दीपावली का विशेष महत्व बताया गया है।
साधकों को शांत भाव से 54 उपचारों या षोडशोपचार पूजन के अनुसार माता का पूजन करना चाहिए।
माता को संपूर्ण पूजन सामग्री और अर्चन अर्पित करने के बाद अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करने से माता बगलामुखी की कृपा प्राप्त करने की कामना की जाती है।
इस स्तोत्र को रुद्रामल तंत्र से प्राप्त किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त विष्णुयामल तंत्र में बताए गए बगलामुखी के नामों और स्तोत्र का भी पाठ किया जा सकता है।
कालरात्रि में 108 बार पाठ करने का विधान बताया गया है।
दीपावली पर माता महालक्ष्मी की कृपा के लिए करें ये 3 हवन
दीपावली की रात पूजा के बाद हवन करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। इसके लिए अलग-अलग सामग्रियों से तीन प्रकार के हवन किए जा सकते हैं।
1. आम की लकड़ी से त्रिमधु हवन
दीपावली की रात माता महालक्ष्मी की पूजा के बाद आम की लकड़ियों से त्रिमधु हवन करें।
इसके लिए शहद, शक्कर और घी समान मात्रा में लें।
यहां शक्कर से तात्पर्य देसी खांड या देसी शक्कर से है।
तीनों सामग्रियों को मिलाकर हवन सामग्री तैयार करें।
इसके बाद इस मंत्र से 108 आहुतियां दें:
ॐ श्री कमलदल निवासिन्यै विष्णुप्रियायै नमो नमः स्वाहा।
मंत्र में नमः का उच्चारण न करके केवल स्वाहा का उच्चारण करने पर भी यह विधि उचित बताई गई है।
2. केला, अमरूद और अनार से हवन
दूसरे हवन के लिए केला, अमरूद यानी जम्बू फल और अनार लें।
तीनों फलों को समान मात्रा में काटकर गाय के घी में मिलाएं।
इसके बाद पहले बताए गए माता महालक्ष्मी के मंत्र से हवन करें।
इस हवन को धन-धान्य की प्राप्ति के लिए विशेष बताया गया है।
3. कनेर के फूलों से तांत्रिक हवन
तीसरे हवन के लिए सूर्यास्त से पहले तोड़े गए कनेर के फूल लें।
इन 108 फूलों को केसर और हल्दी मिश्रित घी में स्पर्श कराएं।
इसके बाद पहले बताए गए मंत्र से माता भगवती राजराजेश्वरी महालक्ष्मी को स्वाहा बोलकर आहुतियां अर्पित करें।
इन तीनों हवनों को माता की कृपा और सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है।
निष्कर्ष
दीपावली केवल दीप जलाने और मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह माता महालक्ष्मी, भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की उपासना का भी विशेष अवसर है।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली के दिन अपनी कुल परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ, मंत्र जप, हवन और साधना की जा सकती है।
इस लेख में बताए गए उपायों को अपनी श्रद्धा, सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार अपनाया जा सकता है। किसी विशेष तांत्रिक साधना, मंत्र अनुष्ठान या हवन को करने से पहले योग्य गुरु का मार्गदर्शन अवश्य लें।
आशा है कि दीपावली विशेषांक में दी गई यह जानकारी आपको पसंद आई होगी।
भगवती राजराजेश्वरी, पीताम्बरा महामाई, बगलामुखी और मां कामाख्या आप सभी का कल्याण करें।
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
जय मां की!

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